लोग आत्महत्या क्यों करते हैं | Why do people commite suicide
1. आत्महत्या की परिभाषा
आत्महत्या (Suicide) का अर्थ है — व्यक्ति द्वारा स्वयं अपने जीवन का जानबूझकर अंत कर लेना।
यह कोई आकस्मिक घटना नहीं होती, बल्कि एक संज्ञात्मक (conscious) और नियोजित (intentional) निर्णय का परिणाम होती है, जो आमतौर पर गहन मानसिक, भावनात्मक या सामाजिक संघर्षों के चलते लिया जाता है।
मनोवैज्ञानिक Émile Durkheim (एमिल दुर्खाइम), जिन्होंने समाजशास्त्र में आत्महत्या का वैज्ञानिक अध्ययन किया, ने आत्महत्या को ऐसे कृत्य के रूप में परिभाषित किया जिसमें व्यक्ति यह जानता है कि उसका कार्य उसके जीवन का अंत कर देगा, फिर भी वह उसे करता है।
आत्महत्या न तो केवल एक मानसिक रोग है, न ही केवल एक व्यक्तिगत असफलता — बल्कि यह मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दबावों की जटिल परिणति है।
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2. विश्व और भारत में आत्महत्या की स्थिति (आंकड़े व तथ्य)
🌍 वैश्विक परिदृश्य
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर वर्ष लगभग 7 लाख लोग आत्महत्या से अपनी जान गंवाते हैं। इसका अर्थ है कि हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है।
यह 15–29 वर्ष की आयु वर्ग में चौथा प्रमुख मृत्यु का कारण है।
आत्महत्या की दरें विशेष रूप से पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, और यूरोप में अधिक पाई गई हैं।
कई देशों ने आत्महत्या रोकथाम (Suicide Prevention) के लिए राष्ट्रीय नीतियाँ बनाई हैं, परंतु सामाजिक कलंक और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
🇮🇳 भारत में स्थिति
भारत में आत्महत्या की समस्या बेहद चिंताजनक है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट (2023) के अनुसार:
हर वर्ष 1.7 लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं।
प्रतिदिन औसतन 460 लोग अपनी जान लेते हैं।
सबसे अधिक प्रभावित आयु वर्ग है 18 से 45 वर्ष — यानी समाज का उत्पादक वर्ग।
आत्महत्या करने वालों में लगभग 70% पुरुष और 30% महिलाएँ होती हैं।
⚙️ कारण और प्रवृत्तियाँ
विद्यार्थी आत्महत्या: कोटा, दिल्ली, और अन्य शहरों में पढ़ाई के दबाव के कारण छात्रों में अवसाद और आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ी हैं।
किसानों की आत्महत्या: आर्थिक संकट, कर्ज़ और फसल खराब होने के कारण किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति गंभीर रूप ले चुकी है।
प्रोफेशनल स्ट्रेस: नौकरी का दबाव, बेरोज़गारी, और अस्थिर जीवनशैली भी कारण बन रहे हैं।
भारत, विश्व की कुल आत्महत्याओं में लगभग 17% योगदान देता है, जबकि इसकी जनसंख्या लगभग 18% है — यानी यह समस्या वैश्विक औसत के लगभग समान है, लेकिन इसके सामाजिक परिणाम कहीं अधिक गहरे हैं।
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3. इस विषय पर बात करना क्यों ज़रूरी है
आत्महत्या पर बात करना समाज में अक्सर वर्जित (taboo) माना जाता है। लोग इसे शर्म, दोष या पाप से जोड़ देते हैं। परंतु चुप्पी ही इसका सबसे बड़ा खतरा है।
1. मौन, आत्महत्या को बढ़ावा देता है:
जो व्यक्ति संघर्ष में है, उसे यदि यह लगे कि समाज उसकी बात नहीं सुनेगा, तो वह भीतर ही भीतर टूट जाता है। बातचीत ही पहला बचाव है।
2. मानसिक स्वास्थ्य को स्वीकारना:
भारत में अब भी अवसाद, चिंता या मनोवैज्ञानिक उपचार को ‘कमज़ोरी’ समझा जाता है। जबकि यह स्वास्थ्य की ही एक श्रेणी है — जैसे शरीर का दर्द, वैसे ही मन का भी इलाज संभव है।
3. शिक्षा और रोकथाम:
आत्महत्या-रोधी प्रयास तभी सफल होंगे जब लोग यह जानें कि इसके संकेत क्या हैं और कब सहायता लेनी चाहिए।
4. सहानुभूति का निर्माण:
आत्महत्या पर खुलकर बात करने से यह संदेश जाता है कि — “आप अकेले नहीं हैं, मदद संभव है।”
इसलिए, आत्महत्या पर संवाद, जागरूकता और शिक्षा समाज की जिम्मेदारी है, क्योंकि हर आत्महत्या केवल एक व्यक्ति का नहीं, पूरे समुदाय का नुकसान होती है।
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4. आत्महत्या का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
आत्महत्या का सबसे गहरा पक्ष है — मनोवैज्ञानिक संघर्ष।
अक्सर व्यक्ति बाहर से सामान्य दिखता है, पर भीतर से टूट चुका होता है। मानसिक और भावनात्मक कारण आत्महत्या के अधिकांश मामलों के केंद्र में पाए गए हैं।
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🧠 (क) डिप्रेशन, चिंता, तनाव और निराशा
डिप्रेशन (अवसाद) आत्महत्या का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है।
डिप्रेशन में व्यक्ति को जीवन में रुचि नहीं रहती, नींद और भूख पर असर पड़ता है, आत्ममूल्य गिरता है और उसे भविष्य में कोई आशा नहीं दिखती।
लगातार चिंता (anxiety), तनाव (stress) और सामाजिक दबाव मिलकर व्यक्ति को निराशा के गहरे गड्ढे में धकेल देते हैं।
संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के अनुसार, अवसादग्रस्त व्यक्ति की सोच नकारात्मक रूप से विकृत हो जाती है —
वह घटनाओं को अतिशयोक्ति से देखता है (“मेरे साथ ही सब बुरा होता है”),
भविष्य को निराशाजनक मानता है (“अब कुछ नहीं बदल सकता”),
और स्वयं को अयोग्य समझता है (“मैं किसी लायक नहीं हूँ”)।
इन्हीं विचारों का निरंतर प्रवाह आत्महत्या की प्रवृत्ति में बदल सकता है।
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💔 (ख) आत्ममूल्य (Self-Esteem) का गिरना
जब व्यक्ति को लगता है कि उसका अस्तित्व अब किसी के लिए मायने नहीं रखता, या वह स्वयं को बेकार समझने लगता है, तो self-esteem collapse हो जाता है।
यह स्थिति विशेष रूप से उन लोगों में देखी जाती है जिन्होंने हाल ही में असफलता, अपमान, या किसी प्रियजन की हानि का अनुभव किया हो।
स्वयं पर विश्वास का टूटना व्यक्ति को यह सोचने पर मजबूर करता है कि “शायद मेरी अनुपस्थिति किसी के लिए बेहतर होगी।”
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⚡ (ग) आघात (Trauma), मानसिक विकार और अकेलापन
अतीत में हुए मानसिक या शारीरिक आघात (trauma) — जैसे शोषण, हिंसा, या बचपन का दुरुपयोग — आत्मघाती प्रवृत्तियों को जन्म दे सकते हैं।
कुछ मानसिक विकार जैसे बाइपोलर डिसऑर्डर, स्किज़ोफ्रेनिया, और बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर में आत्महत्या का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
अकेलापन (loneliness) भी एक बड़ा कारक है।
भले ही व्यक्ति लोगों के बीच रह रहा हो, पर यदि वह भावनात्मक रूप से ‘अनसुना’ महसूस करता है, तो उसके भीतर जीवन से जुड़ाव कमज़ोर पड़ जाता है।
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😔 (घ) “मैं बोझ हूँ” की भावना
मनोवैज्ञानिक थॉमस जॉइनर के Interpersonal Theory of Suicide के अनुसार, आत्महत्या की प्रवृत्ति तीन तत्वों पर आधारित होती है:
1. Perceived Burdensomeness — “मैं दूसरों पर बोझ हूँ।”
2. Thwarted Belongingness — “मैं किसी से जुड़ा नहीं हूँ।”
3. Capability for Suicide — “मुझे अब मरने का डर नहीं रहा।”
जब कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि उसकी उपस्थिति दूसरों के लिए बोझ है, और उसे लगता है कि अब कोई उसे नहीं चाहता — तब जीवन छोड़ने का निर्णय ‘तार्किक’ लगने लगता है।
यह बेहद गहरी और खतरनाक होती है, क्योंकि यह व्यक्ति के आत्म-संरक्षण (self-preservation) की सहज प्रवृत्ति को निष्क्रिय कर देती है।
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✨ संक्षेप में
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से आत्महत्या जीवन से भागना नहीं, बल्कि असहनीय मानसिक पीड़ा से राहत पाने की कोशिश होती है।
इसलिए, रोकथाम का पहला कदम है — उस पीड़ा को समझना, उसे मान्यता देना, और सहायता की दिशा में बढ़ना।
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क्या आप चाहेंगे कि मैं अब अगला हिस्सा —
“3. सामाजिक कारण”
बहुत अच्छा — आपने विशेष रूप से दूसरा भाग चुना है:
“आत्महत्या का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण” और इसके चार उपविषय।
लेख प्रस्तुत है, जो मनोविज्ञान, व्यवहारिक विश्लेषण और भावनात्मक पहलुओं पर आधारित है।
यह भाषा सरल, मानवीय और अकादमिक संतुलन वाली है, ताकि इसे निबंध, शोधपत्र या सामाजिक जागरूकता लेख — किसी भी रूप में प्रयोग किया जा सके।
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🧠 2. आत्महत्या का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
आत्महत्या केवल एक कृत्य नहीं, बल्कि लंबे मानसिक संघर्ष का अंतिम परिणाम होती है।
बहुत बार लोग यह समझ नहीं पाते कि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति मरना नहीं चाहता — वह बस अपनी पीड़ा से छुटकारा चाहता है।
इस पीड़ा की जड़ें मन के उन गहरे स्तरों में होती हैं जहाँ भावनाएँ, विचार और आत्म-बोध आपस में उलझ जाते हैं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आत्महत्या एक बहु-आयामी प्रक्रिया है — जो धीरे-धीरे निराशा, आत्म-संदेह और असहायता की स्थिति में बदल जाती है।
आइए इसे चार मुख्य पहलुओं में समझें:
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🌧️ 1. डिप्रेशन, चिंता, तनाव और निराशा
(क) डिप्रेशन — मौन बीमारी
डिप्रेशन या अवसाद आत्महत्या का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है।
यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति के विचार, भावनाएँ और ऊर्जा — तीनों पर नकारात्मकता हावी हो जाती है।
वह न तो भविष्य में कोई उम्मीद देख पाता है, न वर्तमान में कोई आनंद महसूस करता है।
डिप्रेशन के लक्षणों में शामिल हैं:
लगातार उदासी या खालीपन की भावना
नींद और भूख में परिवर्तन
आत्म-निंदा या अपराधबोध
थकान और ध्यान न लगना
“जीने का कोई अर्थ नहीं” जैसी सोच
मनोवैज्ञानिक Aaron Beck के अनुसार, अवसादग्रस्त व्यक्ति तीन स्तरों पर नकारात्मक सोच विकसित करता है —
(1) स्वयं के प्रति,
(2) दुनिया के प्रति, और
(3) भविष्य के प्रति।
यह “नकारात्मक त्रयी” व्यक्ति को जीवन से विमुख कर देती है।
डिप्रेशन के दौरान मस्तिष्क में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन भी आत्मघाती विचारों को जन्म देता है।
इस स्थिति में व्यक्ति को अपने दर्द का अंत ही एकमात्र समाधान लगता है।
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(ख) चिंता और तनाव — मौन आक्रमणकारी
आज के तेज़ जीवन में चिंता (Anxiety) और तनाव (Stress) सामान्य लगते हैं, परंतु लंबे समय तक रहने पर ये मनोवैज्ञानिक रूप से विनाशकारी हो सकते हैं।
अत्यधिक दबाव, भविष्य की अनिश्चितता, असफलता का भय, या सामाजिक तुलना व्यक्ति को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं।
जब तनाव निरंतर बना रहता है, तो व्यक्ति के मस्तिष्क में कॉर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे बेचैनी, थकान और आत्म-संदेह उत्पन्न होता है।
वह सोचने लगता है —
> “मैं चाहे जितना प्रयास कर लूँ, सब बेकार है।”
यही सोच धीरे-धीरे निराशा में बदलती है।
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(ग) निराशा — आत्महत्या की मूल जड़
कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि आत्महत्या का मुख्य पूर्वानुमानक (predictor) “निराशा” है।
Edwin Shneidman, जो आधुनिक आत्महत्या अध्ययन के जनक माने जाते हैं, ने कहा था:
> “Suicide is not about wanting to die, but about wanting the pain to end.”
(आत्महत्या मृत्यु की इच्छा नहीं, बल्कि पीड़ा से मुक्ति की चाह है।)
जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी समस्याओं का कोई समाधान नहीं है, और भविष्य में कुछ अच्छा संभव नहीं है, तो वह Hopelessness Syndrome में प्रवेश कर जाता है।
यही अवस्था उसे जीवन से विमुख करती है।
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💔 2. आत्ममूल्य (Self-Esteem) का गिरना
आत्ममूल्य या Self-Esteem का अर्थ है — “मैं अपने बारे में क्या सोचता हूँ।”
यह मनुष्य की आत्म-पहचान का केंद्र है।
जब यह भावना कमजोर पड़ती है, तो व्यक्ति अपने अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाने लगता है।
(क) आत्म-सम्मान का विघटन
जब व्यक्ति को लगातार असफलता, अपमान या अस्वीकृति का सामना करना पड़ता है, तो उसका आत्म-सम्मान गिरने लगता है।
उसे लगता है —
> “मैं किसी काम का नहीं हूँ।”
“मेरे होने से किसी को फर्क नहीं पड़ता।”
यह विचार आत्म-संदेह को जन्म देते हैं, और धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी उपयोगिता पर ही विश्वास खो देता है।
(ख) दूसरों से तुलना
सोशल मीडिया और आधुनिक प्रतिस्पर्धा ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है।
लोग लगातार दूसरों की सफलता से अपनी तुलना करते हैं, जिससे हीनभावना गहरी होती जाती है।
कई बार यह तुलना “अदृश्य दबाव” बन जाती है — जो व्यक्ति को भीतर से कुचल देती है।
(ग) पहचान संकट (Identity Crisis)
किशोरावस्था या युवा अवस्था में जब व्यक्ति अपनी पहचान बना रहा होता है, तब असफलता या अस्वीकृति उसका आत्ममूल्य तोड़ सकती है।
“मैं कौन हूँ?” और “मेरा जीवन क्यों महत्वपूर्ण है?” जैसे प्रश्नों के उत्तर न मिलने पर व्यक्ति अस्तित्वगत संकट में पड़ जाता है।
यही अवस्था आत्मघाती विचारों की जड़ बनती है।
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⚡ 3. आघात (Trauma), मानसिक विकार और अकेलापन
(क) आघात (Trauma)
Trauma का अर्थ है — कोई गहरा मानसिक या भावनात्मक घाव जो व्यक्ति के मन में स्थायी प्रभाव छोड़ जाए।
यह किसी घटना, हिंसा, अपमान, या शोषण से उत्पन्न हो सकता है।
ऐसे लोग बार-बार उस घटना को अपने मन में जीते रहते हैं, जिससे भीतर दर्द और अपराधबोध जमा होता जाता है।
वे सोचते हैं कि उन्होंने कुछ “गलत किया”, जबकि वास्तविकता में वे पीड़ित होते हैं।
यह Post-Traumatic Stress Disorder (PTSD) जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है, जिसमें आत्महत्या की संभावना बढ़ जाती है।
(ख) मानसिक विकार
लगभग 90% आत्महत्या के मामलों में किसी न किसी मानसिक विकार का इतिहास पाया गया है।
इनमें प्रमुख हैं:
बाइपोलर डिसऑर्डर: अत्यधिक मूड स्विंग्स — कभी अत्यधिक उत्साह, कभी गहरा अवसाद।
स्किज़ोफ्रेनिया: भ्रम (hallucination) और असामान्य सोच के कारण वास्तविकता से दूरी।
बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर: अस्थिर भावनाएँ, रिश्तों में तीव्र उतार-चढ़ाव।
सब्सटेंस अब्यूज़ (Drugs/Alcohol): मादक पदार्थ व्यक्ति की निर्णय क्षमता को कमजोर करते हैं।
इन विकारों में व्यक्ति का आत्म-नियंत्रण घट जाता है, और भावनाएँ असंतुलित हो जाती हैं, जिससे वह क्षणिक आवेश में आत्मघाती कदम उठा सकता है।
(ग) अकेलापन और सामाजिक अलगाव
अकेलापन केवल “लोगों का न होना” नहीं है — बल्कि “किसी का हमें समझना न होना” है।
आज तकनीकी युग में लोग भले ही हजारों लोगों से जुड़े हों, पर भावनात्मक रूप से बेहद अकेले हैं।
यह emotional isolation आत्महत्या का एक मौन कारण है।
Thomas Joiner के अनुसार, जब व्यक्ति महसूस करता है कि —
1. वह किसी समुदाय या रिश्ते का हिस्सा नहीं है (Thwarted Belongingness),
और
2. वह दूसरों पर बोझ बन गया है (Perceived Burdensomeness),
तो आत्मघाती विचार बढ़ने लगते हैं।
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😔 4. “मैं बोझ हूँ” की भावना
यह भावना आत्महत्या के मनोवैज्ञानिक ढांचे की सबसे खतरनाक कड़ी है।
जब व्यक्ति को यह लगने लगता है कि उसके रहने से दूसरों को तकलीफ हो रही है, तो वह सोचने लगता है कि उसकी मृत्यु दूसरों के लिए राहत होगी।
(क) बोझ बनने का भ्रम
कई बार यह धारणा वास्तविक नहीं होती — व्यक्ति केवल अपने मन में यह मान लेता है कि वह बोझ है।
उदाहरण के लिए, एक बुजुर्ग व्यक्ति सोच सकता है कि परिवार उसके बिना ज़्यादा खुश रहेगा;
एक छात्र सोच सकता है कि वह माता-पिता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा;
या एक बेरोज़गार व्यक्ति यह महसूस कर सकता है कि वह परिवार पर आर्थिक बोझ है।
ये विचार अक्सर Perceived Reality होते हैं — यानी ऐसा नहीं कि वास्तव में वह बोझ है, बल्कि उसे ऐसा लगता है।
(ख) आत्म-दोष और अपराधबोध
यह भावना अपराधबोध (guilt) से भी जुड़ी होती है।
व्यक्ति मानने लगता है कि उसकी गलतियों या असफलताओं से दूसरों को तकलीफ हुई है, इसलिए उसे दंड मिलना चाहिए।
धीरे-धीरे यह आत्म-दंड (self-punishment) की मानसिकता में बदल जाता है, जो आत्महत्या तक जा सकती है।
(ग) “Capability for Suicide” — मृत्यु का डर खत्म होना
Joiner के सिद्धांत के अनुसार, आत्महत्या तब संभव होती है जब व्यक्ति मृत्यु के भय को पार कर लेता है।
लगातार पीड़ा और असहायता की भावना व्यक्ति को इस स्तर तक ले जाती है जहाँ उसे जीवन और मृत्यु में फर्क महसूस नहीं होता।
यह अत्यंत खतरनाक मनोवैज्ञानिक स्थिति होती है।
मनोवैज्ञानिक रूप से आत्महत्या “मृत्यु की इच्छा” नहीं बल्कि “जीवन से राहत की इच्छा” है।
यह एक ऐसे मन की कहानी है जो मदद चाहता है, परंतु उसे यह नहीं पता कि वह कहाँ जाए या किससे कहे।
इसलिए, हमें समाज और परिवार के रूप में यह सीखना होगा कि —
किसी के दर्द को गंभीरता से सुनें,
“सब ठीक हो जाएगा” कहकर टालें नहीं,
मानसिक स्वास्थ्य को उतना ही महत्व दें जितना शारीरिक स्वास्थ्य को देते हैं।
संवाद, सहानुभूति और समय पर सहायता — यही आत्महत्या की रोकथाम की सच्ची कुंजी हैं।
भूमिका
आत्महत्या एक अत्यंत गंभीर सामाजिक एवं मानसिक समस्या है। यह वह स्थिति है जब व्यक्ति जीवन की कठिनाइयों, तनावों या असफलताओं से हार मानकर स्वयं अपनी जीवनलीला समाप्त कर देता है। हर वर्ष लाखों लोग दुनिया भर में आत्महत्या करते हैं, जिनमें विद्यार्थी, किसान, बेरोज़गार युवक, गृहिणियाँ और बुज़ुर्ग सभी शामिल हैं। यह प्रश्न अत्यंत चिंताजनक है कि आखिर लोग आत्महत्या क्यों करते हैं?
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आत्महत्या के प्रमुख कारण
1. मानसिक तनाव और अवसाद (Depression)
आधुनिक जीवन की भागदौड़ में मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा है। जब व्यक्ति अपनी समस्याओं से अकेला महसूस करता है और कोई सहारा नहीं मिलता, तो वह गहरे अवसाद में चला जाता है। अवसाद ही आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण माना जाता है।
2. असफलता का डर
पढ़ाई, नौकरी या रिश्तों में असफलता का डर कई बार व्यक्ति को इतना कमजोर बना देता है कि वह जीवन से भागने की कोशिश करता है। विशेष रूप से युवाओं में यह प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है।
3. आर्थिक समस्याएँ
गरीबी, कर्ज़ और बेरोज़गारी के कारण भी लोग आत्महत्या करते हैं। भारत में किसानों की आत्महत्याएँ इसका सबसे दुखद उदाहरण हैं।
4. पारिवारिक कलह और सामाजिक दबाव
परिवार में झगड़े, रिश्तों में टूटन, या समाज की निंदा का डर भी व्यक्ति को मानसिक रूप से तोड़ देता है।
5. नशे की लत और मानसिक विकार
शराब, ड्रग्स या अन्य नशे व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को नष्ट कर देते हैं। कई बार यह नशे की हालत में लिया गया आवेगपूर्ण निर्णय होता है।
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आत्महत्या के परिणाम
आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज की त्रासदी होती है। इससे परिवार टूट जाता है, बच्चे अनाथ हो जाते हैं और समाज में निराशा फैलती है।
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समाधान
1. मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए।
हर व्यक्ति को अपने मन की बात किसी भरोसेमंद व्यक्ति या काउंसलर से साझा करनी चाहिए।
2. परिवार और मित्रों को संवेदनशील होना चाहिए।
किसी के व्यवहार में परिवर्तन दिखे तो उसे नज़रअंदाज़ न करें।
3. सरकार और समाज को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना चाहिए।
हेल्पलाइन, काउंसलिंग सेंटर, और स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा आवश्यक है।
4. आशा और धैर्य बनाए रखें।
जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, हर समस्या का समाधान संभव है। आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं।
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उपसंहार
आत्महत्या एक ऐसी त्रासदी है, जिसे समझदारी, सहानुभूति और मानसिक समर्थन से रोका जा सकता है। हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ लोग अपने दुखों को छिपाने के बजाय बाँट सकें। याद रखना चाहिए
—
“जीवन अनमोल है, हर अंधेरी रात के बाद एक नई सुबह अवश्य आती है।”

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