गोवर्धन मंदिर का इतिहास | Govardhan mandir ka itihaas Hindi mein
🕉️ गोवर्धन मंदिर और पर्वत का विस्तृत इतिहास
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1. गोवर्धन पर्वत का पौराणिक परिचय
गोवर्धन पर्वत भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा ज़िले में स्थित एक अत्यंत पवित्र और दिव्य स्थल है। यह पर्वत वृंदावन और मथुरा के बीच लगभग 21 किलोमीटर लंबी भूमि पर फैला हुआ है। हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए यह केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप माना जाता है।
‘गोवर्धन’ शब्द दो भागों में विभाजित है — “गो” अर्थात गाय, इंद्रिय या पृथ्वी और “वर्धन” अर्थात पोषण या पालन करने वाला। इस प्रकार गोवर्धन का अर्थ हुआ — “गायों और जीवों का पालन करने वाला पर्वत”।
यह पर्वत वृजमंडल के केंद्र में स्थित है, जिसे “हरिदास गिरि”, “गिरिराज गोवर्धन” और “गिरिराज महाराज” जैसे नामों से भी जाना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह पर्वत सत्ययुग में उत्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि यह मूल रूप से द्रोणाचल पर्वत का पुत्र था और जब पुलस्त्य ऋषि ने इसे अपने साथ ले जाना चाहा, तब यह आज के स्थान पर स्थापित हो गया।
गोवर्धन पर्वत की पवित्रता का उल्लेख वैदिक और पुराणिक ग्रंथों में मिलता है। श्रीकृष्ण की लीलाओं के कारण यह पर्वत ब्रजभूमि का केंद्र बन गया। भक्तों के अनुसार, यह पर्वत श्रीकृष्ण के हृदय के समान है — जो स्नेह, करुणा और भक्ति का प्रतीक है।
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2. श्रीकृष्ण और गोवर्धन लीला
गोवर्धन पर्वत का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग है — गोवर्धन पूजा और इंद्र-विजय लीला।
श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कंध) में इसका अत्यंत सुंदर वर्णन है।
एक बार वृंदावन में इंद्र देव की पूजा की परंपरा के अनुसार लोग इंद्र यज्ञ की तैयारी कर रहे थे। बालक श्रीकृष्ण ने उनसे पूछा —
“हम इंद्र की पूजा क्यों करते हैं? क्या वर्षा इंद्र की कृपा से होती है या प्रकृति के नियम से?”
फिर कृष्ण ने समझाया कि असल में गोवर्धन पर्वत ही वह स्थान है जो गायों के लिए घास, मनुष्यों के लिए फल-फूल, और सबके लिए जल व आश्रय प्रदान करता है। अतः हमें इंद्र की नहीं, बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए।
लोगों ने श्रीकृष्ण की बात मानी और गोवर्धन की पूजा आरंभ की। यह देखकर इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने अभूतपूर्व वर्षा कर दी। जब जल में वृंदावन डूबने लगा, तब श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को उठाकर सभी को शरण दी।
यह घटना केवल दैवी चमत्कार नहीं थी, बल्कि यह अहंकार पर विनम्रता की विजय थी।
इस घटना के उपरांत इंद्र ने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और गोवर्धन पर्वत को ‘गिरिराज’ की उपाधि दी।
तब से दीवाली के अगले दिन, गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन गोवर्धन पर्वत की पूजा कर अन्नकूट (विभिन्न व्यंजनों का ढेर) अर्पित करते हैं।
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3. पुराणों में उल्लेख
गोवर्धन पर्वत का वर्णन अनेक प्रमुख ग्रंथों में मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं —
श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध, अध्याय 24–27)
विष्णु पुराण
स्कंद पुराण (व्रजखंड)
पद्म पुराण
गर्ग संहिता
इन ग्रंथों में गोवर्धन को “साक्षात हरि का रूप” कहा गया है।
स्कंद पुराण में वर्णन आता है कि जब पृथ्वी पर पाप का भार बढ़ा, तो स्वयं भगवान विष्णु ने व्रजभूमि को अपनी लीलाओं के लिए चुना, और गोवर्धन पर्वत को अपने चरणों का आसन बनाया।
विष्णु पुराण में कहा गया है —
> “गोवर्धनं नमस्यामि यः स्वयं हरिरूपधृतः।”
अर्थात् — “मैं उस गोवर्धन को नमस्कार करता हूँ जो स्वयं भगवान हरि का स्वरूप है।”
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4. मध्यकालीन इतिहास व मंदिरों का निर्माण
मध्यकालीन काल में, विशेषकर भक्ति आंदोलन के उदय के समय, गोवर्धन क्षेत्र का महत्व और बढ़ा।
15वीं–16वीं शताब्दी में जब वल्लभाचार्य, चित्तस्वामी, और हरिदास ठाकुर जैसे संतों ने व्रजमंडल में कृष्ण भक्ति का प्रचार किया, तब यहाँ अनेक मंदिरों और कुंडों का पुनर्निर्माण हुआ।
दानघाटी मंदिर, मानसी गंगा मंदिर, राधा कुंड और श्याम कुंड इसी काल में स्थापित या पुनर्स्थापित हुए।
वल्लभाचार्य जी ने गोवर्धन पर्वत की पूजा को “सेवा” का स्वरूप दिया और श्रीनाथजी (गोवर्धनधारी स्वरूप) की मूर्ति की सेवा प्रारंभ की।
मुगल सम्राट अकबर के काल में भी इस क्षेत्र को विशेष धार्मिक मान्यता मिली। अकबर ने राजा टोडरमल और राजा मानसिंह को आदेश दिया था कि वे व्रजभूमि की धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करें।
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5. दानघाटी मंदिर और प्रमुख तीर्थ स्थल
गोवर्धन के चारों ओर अनेक पवित्र स्थल हैं। प्रमुख तीर्थ स्थलों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है —
🛕 दानघाटी मंदिर
यह मंदिर गोवर्धन पर्वत के प्रवेश द्वार पर स्थित है। यहाँ श्रीकृष्ण के उस रूप की पूजा होती है जब उन्होंने गोवर्धन उठाया था। ‘दानघाटी’ नाम इसलिए पड़ा क्योंकि मान्यता है कि यहीं श्रीकृष्ण और गोपियों के बीच “दान” की लीला हुई थी।
🌊 मानसी गंगा
यह एक पवित्र सरोवर है जिसे श्रीकृष्ण की मनो-कामना से उत्पन्न माना जाता है। भक्तजन यहाँ स्नान करके परिक्रमा आरंभ करते हैं।
💧 राधा कुंड और श्याम कुंड
ये दोनों सरोवर राधा और कृष्ण की प्रेम लीलाओं के प्रतीक हैं। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने गोवर्धन लीला के पश्चात गोवर्धन की मिट्टी से यह कुंड बनाया था। यह स्थान व्रज का सबसे पवित्र तीर्थ माना जाता है।
🌺 पंचरीति क्षेत्र
यहाँ पाँच महत्वपूर्ण स्थानों की परिक्रमा की जाती है — दानघाटी, मानसी गंगा, राधा कुंड, श्याम कुंड, और गोविंद कुंड।
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6. गोवर्धन परिक्रमा परंपरा
गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का अत्यंत धार्मिक महत्व है।
पूर्ण परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर लंबी है। भक्तजन नंगे पैर चलते हुए ‘जय गिरिराज महाराज की जय’ का जयघोष करते हैं।
परिक्रमा के दो प्रमुख प्रकार हैं —
1. पूर्ण परिक्रमा – संपूर्ण गोवर्धन पर्वत की 21 किलोमीटर यात्रा।
2. छोटी परिक्रमा – मानसी गंगा से लेकर राधा कुंड तक की लगभग 9 किलोमीटर यात्रा।
भक्त मानते हैं कि एक बार गोवर्धन की परिक्रमा करने से समस्त पापों का नाश होता है। कई संत तो दंडवत परिक्रमा भी करते हैं, जिसमें भक्त प्रत्येक दंडवत के बाद आगे बढ़ते हैं।
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7. भक्ति आंदोलन व संतों का योगदान
भक्ति काल में व्रजभूमि भक्ति और प्रेम का केंद्र बनी।
वल्लभाचार्य, महाप्रभु चैतन्य, सूरदास, मीरा बाई, हित हरिवंश, और नरोत्तम दास ठाकुर जैसे महान संतों ने गोवर्धन की महिमा गाई।
वल्लभाचार्य ने ‘श्रीनाथजी’ के रूप में गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण की पूजा स्थापित की।
उनके शिष्य विट्ठलनाथ जी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
सूरदास जी, जो वल्लभाचार्य के शिष्य थे, ने अपने भजनों में लिखा —
> “गोवर्धन धरन गिरधर गोपाल, दीन दयाल लाल।”
महाप्रभु चैतन्य ने भी अपने व्रज-यात्रा काल में गोवर्धन की परिक्रमा की और इसे भक्ति का सर्वोच्च केंद्र कहा।
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8. मुगल और ब्रिटिश कालीन इतिहास
मुगल काल में, विशेषकर औरंगज़ेब के समय, व्रज क्षेत्र के अनेक मंदिर नष्ट किए गए।
इस काल में गोवर्धन क्षेत्र भी कुछ आक्रमणों का शिकार हुआ, परंतु भक्तों ने पर्वत की पूजा गुप्त रूप से जारी रखी।
ब्रिटिश काल में गोवर्धन एक तीर्थ-नगर के रूप में पुनः संगठित हुआ।
ब्रिटिश अधिकारी इस क्षेत्र की धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं करते थे, जिससे यहाँ के तीर्थों का पुनरुद्धार हुआ।
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9. आधुनिक काल का गोवर्धन
स्वतंत्रता के बाद गोवर्धन पर्वत की धार्मिक और पर्यटन दृष्टि से महत्ता और बढ़ गई।
आज यहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु देश और विदेश से परिक्रमा करने आते हैं।
भारत सरकार और उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ने गोवर्धन क्षेत्र के संरक्षण के लिए अनेक योजनाएँ चलाई हैं।
मानसी गंगा, राधा कुंड और अन्य तीर्थ स्थलों का जीर्णोद्धार किया गया है।
यहाँ हर वर्ष गोवर्धन मेला, अन्नकूट उत्सव, और भाद्रपद पूर्णिमा पर विशाल भक्त-समागम होता है।
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10. सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व का विश्लेषण
गोवर्धन पर्वत केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, प्रकृति, और भक्ति दर्शन का जीवंत प्रतीक है।
यह पर्वत हमें सिखाता है कि प्रकृति ही वास्तविक पालनहार है।
यह घटना अहंकार पर विनम्रता की विजय का संदेश देती है।
यह स्थल गौ-सेवा, पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक भक्ति का प्रतीक बन चुका है।
गोवर्धन पर्वत का दर्शन और परिक्रमा आत्मा को शांति और भक्ति का अनुभव कराते हैं।
भक्तों के लिए यह स्थान गोलोक का द्वार माना जाता है — जहाँ श्रीकृष्ण आज भी अदृश्य रूप में वास करते हैं।
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🌸 उपसंहार
गोवर्धन पर्वत का इतिहास केवल एक कथा नहीं, बल्कि यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक यात्रा है —
जहाँ पौराणिक विश्वास, लोकपरंपरा, भक्ति आंदोलन, और आधुनिक तीर्थ भावना एक सूत्र में बंधी हुई है।
गोवर्धन पर्वत आज भी व्रजभूमि के हृदय में स्थित है —
जहाँ हर भक्त की पुकार गूँजती है —
> “जय जय श्री गोवर्धन महाराज की जय!”
“गिरिराज धरन श्रीकृष्ण की जय

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