बेरोज़गारी क्या है? | berojgari kya hai in hindi

बेरोज़गारी क्या है? | berojgari kya hai in hindi


बेरोज़गारी क्या है? | berojgari kya hai in hindi

बेरोज़गारी क्या है?

बेरोज़गारी एक ऐसी सामाजिक और आर्थिक समस्या है जो किसी देश के विकास में बड़ी बाधा डालती है। यह एक ऐसी स्थिति है, जब श्रमिकों के पास काम करने का अवसर नहीं होता, और वे अपनी आजीविका के लिए मेहनत करके कुछ प्राप्त नहीं कर पाते। बेरोज़गारी केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं होती, बल्कि यह समाज और अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है।


बेरोज़गारी के विभिन्न प्रकार, इसके कारण, प्रभाव, और इससे निपटने के उपायों पर विस्तृत रूप से चर्चा की जा सकती है। इस लेख में हम बेरोज़गारी के सभी पहलुओं पर गहराई से विचार करेंगे।


1. बेरोज़गारी क्या है?

बेरोज़गारी का अर्थ है वह स्थिति जिसमें कार्य करने योग्य व्यक्तियों के पास कोई उपयुक्त रोजगार नहीं होता। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब श्रमिकों की संख्या रोजगार की आवश्यकता को पार कर जाती है। बेरोज़गारी को आमतौर पर "काम की कमी" या "रोजगार की अनुपलब्धता" के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। यह स्थिति समाज में कई प्रकार के तनाव और असंतोष उत्पन्न करती है।


2. बेरोज़गारी के प्रकार

बेरोज़गारी को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

1. स्ट्रक्चरल बेरोज़गारी (Structural Unemployment): यह तब होती है जब समाज की जरूरतों और श्रमिकों के कौशल के बीच अंतर हो। उदाहरण के लिए, अगर किसी विशेष उद्योग में तकनीकी परिवर्तन हो जाए और पुरानी तकनीकों के कामकाजी लोगों को काम से बाहर कर दिया जाए, तो यह बेरोज़गारी का एक रूप बनता है। ऐसे लोग या तो अपग्रेड नहीं हो पाते या फिर उनके लिए नई नौकरियों के अवसर कम होते हैं।


2. फ्रिक्शनल बेरोज़गारी (Frictional Unemployment): यह अस्थायी बेरोज़गारी होती है, जो तब होती है जब व्यक्ति नए काम की तलाश में होता है या किसी नए काम में जा रहा होता है। यह बेरोज़गारी एक सामान्य प्रक्रिया है, और आमतौर पर लंबे समय तक नहीं रहती।


3. साइक्लिकल बेरोज़गारी (Cyclical Unemployment): यह आर्थिक मंदी या व्यापार चक्र के कारण उत्पन्न होती है। जब अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही होती है, तो कंपनियाँ कम उत्पादन करती हैं और बेरोज़गारी दर बढ़ जाती है। यह बेरोज़गारी अर्थव्यवस्था की स्थिति के साथ बढ़ती और घटती रहती है।


4. सीजनल बेरोज़गारी (Seasonal Unemployment): यह बेरोज़गारी उन उद्योगों में देखी जाती है जो मौसम पर निर्भर होते हैं, जैसे कृषि, पर्यटन, और निर्माण कार्य। उदाहरण के लिए, कृषि उद्योग में फसल की कटाई का समय सीमित होता है, जिसके कारण कई श्रमिकों को अन्य समय में बेरोज़गार होना पड़ता है।


3. बेरोज़गारी के कारण

बेरोज़गारी के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. आर्थिक मंदी: जब किसी देश की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही होती है, तो कंपनियाँ उत्पादन कम करती हैं और इससे रोजगार के अवसर घट जाते हैं। मंदी के कारण कंपनियाँ छंटनी करने या कर्मचारियों की संख्या घटाने के लिए मजबूर हो जाती हैं।

2. संसाधनों का असमान वितरण: जब किसी देश में संसाधनों का वितरण समान रूप से नहीं होता, तो कुछ क्षेत्रों में अधिक बेरोज़गारी हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि विकास केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में होता है, तो बाकी क्षेत्रों में बेरोज़गारी बढ़ सकती है।

3. शिक्षा और कौशल में कमी: बेरोज़गारी का एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि श्रमिकों के पास बाजार की जरूरतों के अनुसार आवश्यक कौशल और शिक्षा नहीं होती। यह उन लोगों के लिए कठिनाइयाँ पैदा कर सकता है, जो नई तकनीकों और प्रक्रियाओं से अनजान होते हैं।

4. प्रौद्योगिकी का विकास: जैसे-जैसे तकनीकी विकास हो रहा है, कुछ उद्योगों में स्वचालन और रोबोटिक प्रक्रियाओं के कारण कई कामों में लोगों की जरूरत कम हो गई है। इससे बेरोज़गारी की दर बढ़ सकती है, क्योंकि मशीनों ने मनुष्यों की जगह ले ली है।

5. जनसंख्या वृद्धि: बढ़ती हुई जनसंख्या, विशेष रूप से विकासशील देशों में, रोजगार के अवसरों के मुकाबले अधिक श्रमिकों को जन्म देती है। परिणामस्वरूप, बेरोज़गारी दर में वृद्धि होती है।

6. सरकारी नीतियाँ और नियम: सरकारी नीतियाँ और नियम भी बेरोज़गारी की दर पर प्रभाव डाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, अत्यधिक कराधान, व्यापार पर प्रतिबंध, या अधिक नियंत्रण रोजगार सृजन में रुकावट डाल सकते हैं।


4. बेरोज़गारी के प्रभाव

बेरोज़गारी न केवल व्यक्तिगत स्तर पर, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर प्रभाव डालती है।

1. आर्थिक प्रभाव: बेरोज़गारी के कारण उत्पादन की क्षमता घट जाती है, क्योंकि श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन पाते। यह राष्ट्रीय आय को प्रभावित करता है और देश के विकास की गति को धीमा कर देता है।

2. सामाजिक प्रभाव: बेरोज़गारी समाज में असंतोष, अपराध, और सामाजिक अस्थिरता का कारण बन सकती है। बेरोज़गार लोग अक्सर मानसिक तनाव, अवसाद, और आत्महत्या जैसी स्थितियों का सामना करते हैं। इससे सामाजिक एकता भी प्रभावित हो सकती है।

3. राजनीतिक प्रभाव: जब बेरोज़गारी अधिक होती है, तो लोग सरकार से नाराज़ हो सकते हैं और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है। यह किसी भी देश की राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है और शासन परिवर्तन की स्थिति पैदा कर सकता है।

4. व्यक्तिगत प्रभाव: बेरोज़गार व्यक्ति के जीवन पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, परिवारिक तनाव, और आत्मसम्मान में कमी इसके उदाहरण हैं। इसके अलावा, बेरोज़गारी व्यक्ति के भविष्य की योजनाओं को भी बाधित कर सकती है।


5. बेरोज़गारी का समाधान

बेरोज़गारी की समस्या से निपटने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं।

1. आर्थिक विकास: आर्थिक विकास को बढ़ावा देना बेरोज़गारी को कम करने का एक प्रभावी तरीका है। यदि अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ती है, तो व्यवसायों के लिए अधिक रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं।

2. शिक्षा और कौशल विकास: शिक्षा प्रणाली में सुधार और श्रमिकों को तकनीकी कौशल सिखाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए। यह श्रमिकों को रोजगार योग्य बनाने में मदद करेगा।

3. स्वतंत्रता और उद्यमिता को बढ़ावा देना: सरकार को छोटे और मध्यम व्यवसायों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग अपने व्यवसाय शुरू कर सकें। इससे नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और बेरोज़गारी दर में कमी आएगी।

4. सरकारी योजनाएँ और रोजगार सृजन: सरकार को बेरोज़गारी के समाधान के लिए कई योजनाएँ और परियोजनाएँ शुरू करनी चाहिए, जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ, ग्रामीण विकास कार्यक्रम, और शहरी रोजगार योजना।

5. सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क: बेरोज़गारों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का निर्माण किया जा सकता है, जैसे बेरोज़गारी भत्ता, स्वास्थ्य सेवाएँ, और अन्य सहायता योजनाएँ। इससे बेरोज़गार व्यक्तियों को मानसिक और आर्थिक सहारा मिलेगा।

बेरोज़गारी एक जटिल और गंभीर समस्या है, जो न केवल व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करती है, बल्कि पूरे समाज और अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचाती है। इसके समाधान के लिए सरकार, उद्योग, और समाज को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। यदि बेरोज़गारी को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जाए, तो यह समाज में समृद्धि और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।


🧩 बेरोज़गारी की विशेषताएँ (Characteristics of Unemployment in Hindi)


बेरोज़गारी एक सामाजिक-आर्थिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति कार्य करने की क्षमता और इच्छा रखते हुए भी काम नहीं पा पाता। इसकी कई प्रमुख विशेषताएँ होती हैं जो इस समस्या की प्रकृति, सीमा और प्रभाव को स्पष्ट करती हैं।

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1. कार्य करने की इच्छा होते हुए भी काम का अभाव

बेरोज़गारी की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि व्यक्ति काम करना चाहता है और उसके पास कार्य करने की शारीरिक एवं मानसिक क्षमता भी होती है, फिर भी उसे कोई उपयुक्त रोजगार नहीं मिल पाता।

👉 उदाहरण – कोई स्नातक युवा काम की तलाश में है, लेकिन उसे नौकरी नहीं मिल रही।


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2. श्रम-शक्ति का अप्रयुक्त रहना


बेरोज़गारी का मतलब है कि देश की श्रम-शक्ति (manpower) का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। जब लोग निष्क्रिय रहते हैं तो उत्पादन क्षमता घट जाती है और राष्ट्रीय आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

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3. असमान अवसर (Inequality of Opportunities)

रोजगार के अवसर सभी के लिए समान नहीं होते। कुछ क्षेत्रों, जातियों या वर्गों में अवसरों की कमी अधिक देखी जाती है। यह सामाजिक असमानता को और गहरा करती है।

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4. शिक्षा और रोजगार के बीच असंतुलन

भारत जैसे देशों में शिक्षित बेरोज़गारी बहुत आम है। इसका कारण यह है कि शिक्षा प्रणाली बाज़ार की मांग के अनुसार कौशल नहीं देती। नतीजतन डिग्रियाँ तो मिलती हैं, लेकिन नौकरियाँ नहीं।

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5. क्षेत्रीय असंतुलन

कुछ क्षेत्र आर्थिक रूप से विकसित होते हैं जबकि अन्य पिछड़े रह जाते हैं। विकसित क्षेत्रों में रोजगार अधिक होते हैं, जबकि ग्रामीण या पिछड़े इलाकों में बेरोज़गारी की दर अधिक होती है।

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6. मौसमी प्रवृत्ति (Seasonal Nature)

भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर आधारित है, जो मौसमी कार्य है। फसल बोने या काटने के समय रोजगार मिल जाता है, परंतु बाकी महीनों में श्रमिक बेरोज़गार रहते हैं।

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7. आंशिक रोजगार (Underemployment)

कई बार लोग काम तो करते हैं, परंतु पूरा समय नहीं या उनकी क्षमता से कम उपयोग होता है। उदाहरण के लिए, एक इंजीनियर अगर रिक्शा चला रहा है, तो यह आंशिक बेरोज़गारी है।

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8. जनसंख्या वृद्धि से जुड़ी समस्या

तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या बेरोज़गारी की एक स्थायी विशेषता बन चुकी है। जनसंख्या जितनी तेज़ी से बढ़ती है, उतने रोजगार के अवसर उत्पन्न नहीं हो पाते।

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9. आर्थिक अस्थिरता का द्योतक

जब बेरोज़गारी बढ़ती है तो यह संकेत होता है कि देश की अर्थव्यवस्था अस्थिर है या धीमी गति से बढ़ रही है। यह उत्पादन, निवेश और उपभोग — तीनों पर असर डालती है।

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10. सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव

बेरोज़गारी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक समस्या भी है। बेरोज़गार व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी, तनाव, अवसाद, और अपराध की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।

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11. अस्थायी और स्थायी दोनों रूपों में विद्यमान

बेरोज़गारी अस्थायी (temporary) भी हो सकती है, जैसे किसी व्यक्ति को नौकरी बदलने में समय लगना, और स्थायी (permanent) भी, जैसे किसी क्षेत्र में लंबे समय से रोजगार के अवसरों का अभाव।

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12. विकासशील देशों में अधिक प्रचलन

बेरोज़गारी की समस्या विशेषकर विकासशील देशों में अधिक होती है क्योंकि वहाँ औद्योगिक विकास सीमित, शिक्षा असंगठित और जनसंख्या वृद्धि अधिक होती है।

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13. तकनीकी परिवर्तन का प्रभाव

नई तकनीक और स्वचालन (automation) के कारण कई पारंपरिक नौकरियाँ समाप्त हो जाती हैं। इससे तकनीकी बेरोज़गारी की स्थिति पैदा होती है।

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14. ग्रामीण-शहरी अंतर

ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित और मौसमी बेरोज़गारी अधिक होती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में शिक्षित और तकनीकी बेरोज़गारी प्रमुख होती है।

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15. सरकार पर बोझ

बेरोज़गारी बढ़ने पर सरकार को बेरोज़गारी भत्ता, सार्वजनिक रोजगार योजनाएँ और सामाजिक सुरक्षा खर्च बढ़ाना पड़ता है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है।

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🔍 संक्षेप में

बेरोज़गारी की विशेषताएँ यह दर्शाती हैं कि यह केवल “नौकरी न मिलने” की स्थिति नहीं है, बल्कि यह समाज, अर्थव्यवस्था और व्यक्ति — तीनों पर गहरा प्रभाव डालने वाली बहुआयामी समस्या है।

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