नीलकंठ मंदिर का इतिहास | Neelkanth mandir ka itihaas Hindi mein
नीलकंठ महादेव मंदिर भारत के प्रसिद्ध शिव मंदिरों में से एक है और इसका इतिहास धार्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश में कई स्थानों पर "नीलकंठ मंदिर" हैं, लेकिन विशेष रूप से उत्तराखंड के ऋषिकेश के पास स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर सबसे प्रसिद्ध है।
🛕 नीलकंठ महादेव मंदिर, उत्तराखंड का इतिहास
📍 स्थान:
यह मंदिर ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर दूर, पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित है।
यह समुद्र तल से लगभग 1330 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, और चारों ओर से पहाड़ियों और जंगलों से घिरा हुआ है।
🕉️ पौराणिक कथा
🔱 समुद्र मंथन और विषपान की कथा:
यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका इतिहास समुद्र मंथन से जुड़ा है।
जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, तो उसमें चौदह रत्न निकले, जिनमें से एक था कालकूट विष (हलाहल विष)।
यह विष इतना घातक था कि उससे संपूर्ण सृष्टि के विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया।
तब भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को पी लिया।
उन्होंने विष को अपने कंठ (गले) में रोक लिया, जिससे उनका गला नीला हो गया और तभी से उन्हें "नीलकंठ" कहा जाने लगा।
कहा जाता है कि विष पीने के बाद शिवजी ने इसी स्थान पर तपस्या की थी।
🛕 मंदिर की विशेषताएं
मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति है जो उन्हें विषपान करते हुए दर्शाती है।
यहाँ हर साल श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) में लाखों श्रद्धालु दर्शन और जल चढ़ाने के लिए आते हैं।
शिवरात्रि पर भी यहां विशेष उत्सव होता है।
मंदिर परिसर में एक पवित्र जलकुंड भी है जहाँ भक्त स्नान करते हैं।
🌄 स्थानीय महत्व और पर्यटन
यह स्थान धार्मिक के साथ-साथ प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है।
मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को एक सुंदर और हरियाली से भरी ट्रैकिंग करनी पड़ती है।
यात्रा मार्ग में कई छोटे झरने और नदी-नालों का दृश्य भी देखने को मिलता है।
📜 अन्य प्रसिद्ध नीलकंठ मंदिर:
नीलकंठेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश – यह भी भगवान शिव को समर्पित है।
नीलकंठ मंदिर, राजस्थान (राजसमंद जिला) – पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
शिव के नीलकंठ रूप की कथा से जुड़ा:
यह वही स्थान माना जाता है जहाँ समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष को भगवान शिव ने ग्रहण किया था।
विष पीने से उनका कंठ नीला पड़ गया, इसलिए उन्हें "नीलकंठ" कहा गया।
मंदिर उसी पौराणिक घटना की स्मृति में बनाया गया है।
प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर:
मंदिर हिमालय की गोद में बसा है और चारों ओर से हरे-भरे जंगल व पहाड़ हैं।
मंदिर के पास से बहती पवित्र नदी गंगा की सहायक नदियाँ इस क्षेत्र को और भी पवित्र बनाती हैं।
आस्था का केंद्र:
हर साल लाखों श्रद्धालु, खासकर श्रावण मास और महाशिवरात्रि के समय, यहाँ पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
कई भक्त कांवड़ यात्रा के रूप में हरिद्वार से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।
मंदिर की वास्तुकला:
मंदिर की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियाँ और चित्र बने हुए हैं।
गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है, जिस पर भक्त जल, बेलपत्र, दूध आदि चढ़ाते हैं।
तीर्थ यात्रा का अनुभव:
मंदिर तक पहुँचने के लिए पैदल यात्रा करनी पड़ती है, जो भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव होता है।
यात्रा के दौरान प्राकृतिक दृश्यों के साथ-साथ भजन-कीर्तन का माहौल बना रहता है।

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