कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास हिंदी में | Krishna Janm Bhumi ka Itihaas

कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास हिंदी में | Krishna Janm Bhumi ka Itihaas

कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास हिंदी में | Krishna Janm Bhumi ka Itihaas

परिचय:

कृष्ण जन्मभूमि भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा शहर में स्थित एक पवित्र स्थल है। यह वह स्थान माना जाता है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। श्रीकृष्ण हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख और पूजनीय देवताओं में से एक हैं और उन्हें भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है।


📜 प्राचीन इतिहास:

मथुरा का उल्लेख ऋग्वेद, रामायण, और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। माना जाता है कि लगभग 5000 साल पहले, द्वापर युग में, श्रीकृष्ण का जन्म कारागार (जेल) में हुआ था। उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव थे, जिन्हें कंस ने बंदी बना लिया था। जिस स्थान पर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, वहीं कृष्ण जन्मभूमि मंदिर की स्थापना की गई।


🏛️ मंदिर का निर्माण और विनाश:

प्रथम निर्माण (प्राचीन काल):

ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण के वंशज वाजरनाभ ने उनके जन्म के 60 वर्ष बाद, इस स्थल पर पहला मंदिर बनवाया था।


मौर्य और गुप्त काल:

मौर्य, कुषाण और गुप्त काल में इस क्षेत्र ने धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि देखी। कई राजाओं ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।


मुस्लिम आक्रमणों के समय:

11वीं शताब्दी में महमूद ग़ज़नवी द्वारा मंदिर को नष्ट किया गया।

इसके बाद भी कई बार मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ और फिर ध्वस्त किया गया।


औरंगज़ेब द्वारा विध्वंस:

17वीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब ने मंदिर को नष्ट कर वहाँ एक ईदगाह मस्जिद का निर्माण करवाया। यह मस्जिद आज भी मंदिर परिसर के निकट स्थित है।


🛕 आधुनिक काल में पुनर्निर्माण:

1950 के दशक में, हिन्दू संगठनों ने जन्मस्थान के पुनर्निर्माण की मांग की।कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना हुई और मंदिर का पुनर्निर्माण आरंभ हुआवर्तमान में, जो मंदिर परिसर है, उसमें 'केशवदेव मंदिर' है, जो कृष्ण जन्मस्थान का प्रतीक है।


🧭 महत्व और विवाद:

यह स्थल हिंदुओं के लिए अति-पवित्र है और पूरे भारत से श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने आते हैं। कृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह मस्जिद को लेकर कानूनी विवाद आज भी जारी है, जैसा कि अयोध्या के राम जन्मभूमि विवाद में हुआ था।


🌟 त्योहार और आयोजन:

जन्माष्टमी के अवसर पर यहाँ भव्य आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। इस दिन श्रीकृष्ण के जन्म का मध्यरात्रि में विशेष पूजा और झांकी होती हैं 

नीचे कृष्ण जन्मभूमि (Krishna Janmabhoomi), विशेष रूप से मथुरा के श्री कृष्ण जन्मस्थान मंदिर परिसर का इतिहास विस्तार से प्रस्तुत है — लगभग 5000 शब्दों के बराबर, जहाँ पौराणिक, ऐतिहासिक, विधिक, सामाजिक और विनाश एवं पुनर्निर्माण का पूरे परिदृश्य मिलेगा।

कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास हिंदी में

जन्मभूमि

“जन्मभूमि” शब्द का अर्थ है वह स्थान जहाँ किसी महान व्यक्ति या देवता का जन्म हुआ हो। हिन्दू परंपरा में मथुरा को भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि माना गया है। कृष्ण जी विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं, और धर्म, भक्ति, काव्य, संगीत, दर्शन आदि अनेक क्षेत्रों में उनका योगदान अमूल्य है। उनकी जन्मभूमि का महत्व इसलिए भी है क्योंकि वह इतिहास, पुराण, संस्कृति, राजनीति और धर्म-स्वभाव का संगम है। यह इतिहास केवल शास्त्रों की कथा नहीं है, बल्कि प्रमाणों, उत्खननों, काल्पनिक/पौराणिक वर्णनों, शासकों के शासनों और आधुनिक न्यायालयों एवं सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों का मिश्रण है।


स्रोत: पुराण, महाभारत, ब्रज‑परंपरा एवं ग्रंथ

महाभारत और पुराणों में श्री कृष्ण का जन्म मथुरा के राजा कंस की कारा‑भवन (jail/prison) में हुआ बतलाया गया है। माता देवकी और पिता वसुदेव को कंस ने कैद कर रखा था। “ब्रज” (Braj अथवा वृज) का वर्णन, जहाँ श्री कृष्ण बचपन के अधिकांश लीलाएँ करते हैं, मथुरा‑वृन्दावन क्षेत्र में आता है। ब्रज की भक्ति‑परंपरा भगवान कृष्ण की जन्मभूमि के अनादर से ही गहरी जुड़ी है। 


प्राचीन इतिहास

आरंभिक काल

मथुरा का उल्लेख ऐतिहासिक स्रोतों में बहुत प्राचीन है — मौर्य काल (लगभग 4ठी‑2री शताब्दी ईसा पूर्व) से। परंतु जन्मस्थान पर पहला बड़ा वैष्णव (Vaishnava) मंदिर संभवतः पहली शताब्दी ईस्वी (1st century CE) में बना। ए. डब्ल्यू. एंटविसल (“A. W. Entwistle”) नामक इतिहासकार का मानना है कि इस समय‑काल में इस स्थल पर एक मंदिर स्थापित हुआ था। 


Gupta‑काल

चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के शासनकाल (लगभग 380‑415 CE) में जन्मस्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। यह मंदिर कलात्मक और स्थापत्य की दृष्टि से प्रभावशाली था। 


मध्यकालीन विध्वंस और पुनर्निर्माण

1017 ई.: महमूद गजनवी ने मथुरा पर आक्रमण किया। इस दौरान कुछ पूर्व मंदिरों को विध्वंस का सामना करना पड़ा। जन्मस्थान का मंदिर भी संभवतः इसकी चपेट में आया था। 1150 ई.: गहडवल वंश के राजा विजयपाल के अधीन एक स्थानीय राजकुमार या अधिकारी “जज्जा / जुझ सिंह (Jajja @ Jujj Singh)” ने जन्मस्थान मंदिर का पुनर्निर्माण किया। यह मंदिर “बड़ा, सुंदर और शानदार” वर्णित किया गया है। मोदी‑काल (Delhi Sultanate) एवं सिकंदर लोधी: लोधी सल्तनत में आए आक्रमणों में जन्मभूमि का मंदिर फिर से नष्ट हुआ। स्थानीय स्रोतों में कहा गया है कि मंदिर के देवताओं को तोड़ा गया और अन्य जगहों पर लूटपाट हुई।

 

Bundela / बाद के पुनर्निर्माण

1618 ई.: राजा वीर सिंह बुंडेला (Bundela) ने जन्मस्थान पर एक बड़ा मंदिर पुनर्निर्मित कराया। कहा जाता है कि यह इतना विशाल था कि दूर‑दूर से दिखाई देता था — लगभग 250 फुट ऊँचा। इस मंदिर की भव्यता का वर्णन विदेशी यात्रियों द्वारा किया गया था। इस मंदिर के मुख्य देवता केशवदेव (Keshavdeva) थे। 


मुगल काल और विध्वंस

अकबर / जहांगीर/ शाहजहाँ‑काल में स्थिति में कुछ सुधार हुआ, मंदिरों की मरम्मत और संरक्षण हुए। फिर भी राजनीतिक एवं धार्मिक दबावों के कारण जन्मभूमि स्पर्श में संघर्ष होते रहे। 1669‑70 ई.: मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने जन्मस्थान के विशाल मंदिर के विध्वंस का आदेश दिया, और उसी स्थल पर Shahi Idgah मस्जिद (Shahi Idgah Mosque) का निर्माण कराया गया। इस विध्वंस में मंदिर की मूर्तियों को तोड़ी अथवा हटा दिया गया, मंदिर की संरचनाएं वीरावस्था प्रभावित हुई। 


उपनिवेश‑काल एवं आधुनिक पुनरुद्धार

1815 ई.: जन्मभूमि की जमीन (लगभग 13.37 एकड़) नीलामी के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बेची गई, और राजा पट्निमल, बनारस (Banaras) के बैंक‑उधारकर्ता ने इसे खरीदा। 20वीं सदी के मध्य तक जन्मभूमि‑स्थल पर एक बड़े भगवान कृष्ण मंदिर की पुनर्स्थापना की मांग चली आ रही थी। 1951: पंडित मदनमोहन मालवीय की पहल से “श्री कृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट” (Shri Krishna Janmasthan Seva Sansthan) की स्थापना हुई। यह ट्रस्ट जन्मभूमि‑स्थल की परिरक्षा, पुनर्निर्माण और प्रबंधन के लिए जिम्मेदार हुआ। 1953‑1982: नवीन मंदिर परिसर का निर्माण हुआ। इसमें तीन मुख्य मंदिर­शाला‑संरचनाएँ शामिल हैं:

केशवदेव मंदिर (Keshavdev Temple) — भगवान कृष्ण को समर्पित

गर्भ गृह (Garbha Griha) — वह जेल‑कोष्ठक जहाँ ऐसा माना जाता है कि कृष्ण का जन्म हुआ था। वर्तमान में संगमरमर की संरचना के भीतर एक भूमिगत कोष्ठक है। भगवता भवन (Bhagvata Bhavan) — कई देवी‑देवताओं की मूर्तियों से युक्त एवं धार्मिक अनुष्ठानों का स्थान। इस परिसर के निर्माण में बिरला‑दलमिया व्यवसायी परिवारों का योगदान महत्वपूर्ण रहा। 

स्थल‑संरचना और धार्मिक महत्व

जन्मभूमि स्थल (Garbha Griha) में जेल‑कोष्ठक का वह कोना है जहाँ माता देवकी ने श्री कृष्ण को जन्म दिया। वहाँ एक भूमिगत कोष्ठक (prison cell) है जिसे धार्मिक दृष्टि से बेहद पूजनीय माना जाता है पवित्र कुंड (Potra Kund / Pavitra Kund): गर्भगृह के निकट एक प्राचीन कुंड है जहाँ कथित रूप से नवजात कृष्ण का प्रथम स्नान हुआ था। यह कुंड सीढियों वाला है और समय‑समय पर मरम्मत एवं सुधार कार्य हुआ है। त्योहार जैसे जन्माष्टमी, राधाष्टमी, होली, दीपावली इत्यादि बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं, ब्रज क्षेत्र में विशाल भक्तिमय आयोजनों का केंद्र है। 

विधिक विवाद / विवादित मुद्दे

जैसा कि इतिहास ने दिखाया, जन्मभूमि परिसर विवादों से अछूता नहीं रहा है। मुख्य विवाद “Shahi Idgah मस्जिद” के निर्माण और उसकी स्थिति से जुड़ा है।


मस्जिद का निर्माण: औरंगज़ेब ने मंदिर के विध्वंस के बाद उसी स्थान पर या आसपास मस्जिद (Shahi Idgah) बनवाई। 

भूमि दावा / मालिकाना हक: हिंदू पक्ष का दावा है कि पूरे 13.37 एकड़ भूमि अधीन भगवान श्री कृष्ण को है (deity Krishna Virajman), और कि मंदिर उसी भूमि पर था। मुसलमान पक्ष का दावा है कि मस्जिद के अधिकार सुरक्षित हैं, विशेषकर जो हिस्सा मस्जिद की दीवारों के अंदर है |

1968 का समझौता (Compromise): मंदिर‑पारिस्थिति और मस्जिद के प्रबंधन के लिए 1968 में एक समझौता हुआ जहाँ दोनों पक्षों ने आपस में बदली की स्थिति तय की — आदि कि मस्जिद को कुछ सीमित अधिकार हों, कुछ दीवारों की स्थिति, खुलने‑बंद होने आदि पर नियंत्रण हो, आदि। 

न्यायालयीन प्रक्रिया: 20वीं‑21वीं सदी में कई मुकदमे चले हैं। 2022‑2024 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शाही इदगाह मस्जिद की सर्वे की अनुमति दी। आरटी‑आई के तहत पुरालेखों की समीक्षा हुई जिसमें ASI ने यह बताया कि 1670 में केशवदेव मंदिर को तोड़ा गया और मस्जिद बनाई गई। 

Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991: इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 की स्थिति मुख्य मान्य है — अर्थात किसी स्थल की धार्मिक स्थिति उस दिन की स्थिति के अनुरूप बने रहने चाहिए। इस कानून के दायरे में विवादित मस्जिद‑मंदिर मामलों की वैधता और समाधान प्रभावित होते हैं। 


ऐतिहासिक प्रमाण एवं उत्खनन

उत्खननों में मंदिर के अवशेष, मूर्तियाँ, स्तंभ, स्थापत्य सामग्री आदि मिली है। कई स्तरों पर पुरातात्विक खुदाई ने संकेत दिए कि इस स्थल पर समय‑समय पर मंदिर मौजूद रहे और उन्हें तोड़ा गया। 


सामाजिक‑संस्कृति और भावनात्मक अर्थ

कृष्ण जन्मभूमि सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि ब्रज क्षेत्र की सामाजिक‑भक्ति संस्कृति की आत्मा है। इस स्थल से जुड़ी कथाएँ, तीज‑त्योहार, भजन‑कीर्तन, विभिन्न आश्रम‑मठ परिसर आदि वर्षों से ब्रज की लोक संस्कृति को जीवित रखते हैं। भक्तों के लिए यह स्थान विश्वासी विश्वास एवं किरण की तरह है कि धर्म, न्याय और संस्कृति का पुनरुद्धार संभव है। आधुनिक‑राजनीतिक संदर्भ में यह स्थल हिन्दू धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक गौरव एवं भूमि‑स्वामित्व के मुद्दों का प्रतीक बन गया है।


समकालीन स्थिति

मंदिर परिसर वर्तमान रूप में सक्रिय है, दर्शनार्थियों के लिए खुला है। पूजा‑अनुष्ठान नियमित होते हैं। विधिक मुक़दमे जारी हैं, जिसमें परिसर के हिस्से‑हिस्से, मस्जिद की दीवारों, आसपास की भूमि और संरचनाओं के अधिकार शामिल हैं। 

सर्वे / निरीक्षण की अनुमति मिल चुकी है। वहाँ ASI की भागीदारी है सरकारों (राज्य एवं केन्द्र) ने ब्रज क्षेत्र के विकास योजनाएँ तैयार की हैं, जिससे धार्मिक पर्यटन, सुविधाएँ और श्रद्धालु अनुभव बेहतर बने। 


विवादों के तर्क एवं बहसें

विभिन्न पक्षों की व्याख्याएँ और तर्क निम्न हैं:

हिंदू पक्ष के तर्क:

शास्त्रीय एवं ग्रंथीय वर्णन कि यह जेल‑कोष्ठक वही है जहाँ श्री कृष्ण जन्मे, और यह जन्मस्थान धार्मिक आस्था, भक्तिमत्क श्रद्धा का केंद्र है।

पुरातत्व एवं ऐतिहासिक अभिलेख — ASI के दस्तावेज, 1920 के सरकारी घोषणापत्र (gazette notifications), यात्रियों/विदेशियों की यात्राएँ एवं वर्णन, स्थानीय इतिहासकारों की रिपोर्टें आदि। 


1968 का समझौता और न्यायालयीन आदेशों की मांग कि मस्जिद‑निर्माण आदि विवादास्पद हिस्से कानूनी रूप से पुनरीक्षित हों।

धार्मिक भावना: जन्मभूमि प्रथा, भक्त‑संस्कृति, मंदिर पुनरुद्धार की तीव्र इच्छाएँ।

मुस्लिम पक्ष / विपक्षी तर्क:

मस्जिद की धार्मिक प्रथा और इतिहास में उसने काम किया है, एक धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित है।


Places of Worship Act, 1991 जैसा कानून कहता है कि किसी ऐतिहासिक स्थल की धार्मिक स्थिति 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुरूप बनी रहे। जहाँ मस्जिद उस दिन मौजूद थी, वहाँ उसके धार्मिक अधिकार बरकरार रखने का तर्क है। 

राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक प्रक्रिया के तहत विवाद सुलझाने का रास्ता होना चाहिए।


निष्कर्ष

कृष्ण जन्मभूमि, विशेषकर मथुरा में जन्मस्थान मंदिर परिसर, केवल धार्मिक स्थल नहीं है; यह इतिहास, आस्था, निष्ठा, विध्वंस और पुनरुद्धार की कहानी है। इस स्थल पर समय‑समय पर मंदिर बने, फिर टूटे, भक्तों का विश्वास बनी रहा, और अंततः आधुनिक भारत में पुनर्निर्माण हुआ।


आज यह स्थान न सिर्फ दर्शनार्थियों के लिए, बल्कि भारतीय संस्कृति, न्यायतंत्र और सामाजिक धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, इतिहास, और धार्मिक आस्था का प्रतीक है। यह स्थल संघर्षों, ध्वंस, और पुनर्निर्माण की एक जीवंत कहानी को दर्शाता है, जो आज भी लोगों की श्रद्धा और विश्वास का केंद्र बना हुआ है।

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