हुमायूँ का मकबरा का इतिहास हिन्दी में | history of humayun tomb in hindi
हुमायूँ का मकबरा दिल्ली मेंहुमायूँ का मक़बरा नई दिल्ली के निजामुद्दीन पूर्व क्षेत्र और मथुरा वाले रोड के पास में है जहाँ से कुछ दूर में ही पुराना किला है और चिड़ियाघर है,1 जनवरी 1556 में हुमायूँ का मौत हो गया था उसके बाद हुमायूँ की पत्नी हमीदा बेगम ने सन् 1565 में हुमायूँ का मक़बरा बनना चालू हो गया था लेकिन बनते-बनते कई वर्ष लगे सन् 1565 से लेकर 1572 के बीच में हुमायूँ का मक़बरा बना था,इस मकबरे के अंदर 100 से भी अधिक क़ब्र हैं,इसी के कारण इसका नाम मुगलो का शयनागार पड़ा|
हुमायूँ का मकबरा का इतिहास:-
हुमायूँ के मक़बरे के पास में ही एक पुराना किला है जिसका पहले नाम था दीनपनाह,पुराने किले के अंदर ही एक शेर मंडल है जहाँ से 1 जनवरी 1556 में हुमायूँ सीढ़ियों गिरकर मर गया था,हुमायूँ के मौत के कई साल बाद में हमीदा बानू बेगम ने हुमायूँ का मक़बरा का निर्माण किया था,सन् 1565 में ही हुमायूँ का मक़बरा बनना चालू हो गया था लेकिन बनते-बनते सन् 1572 में बनकर तैयार हो गया था
हुमायूँ के मौत के बाद हुमायूँ को पुराने किले के अंदर ही दफ़ना दिया गया था लेकिन जब हुमायूँ का मक़बरा बना तो हुमायूँ का क़ब्र को हुमायूँ के मकबरे के अंदर ले जाकर दफ़ना दिया गया,पुराने किले का पहले नाम था दीनपनाह
जिसे आज के समय में पुराने किले के नाम से जाना जाता है इसीलिए कुछ लोगों का यह कहना हैं कि हुमायूँ का क़ब्र दीनपनाह जगह पर है लेकिन नहीं वर्तमान में हुमायूँ का कब्र हुमायूँ के मकबरे के अंदर हैं जिसमें काफी सारे क़ब्र हैं
1 जनवरी 1556 में पुराने किले के सीढ़ियों से गिरकर हुमायूं का मौत हो गया था तो पुराने किले के अंदर ही हुमायूं को दफ़ना दिया गया था उसके 9 साल बाद हमीदा बानू बेगम ने हुमायूँ का मक़बरा बनाने के लिए सोचा फिर 1565 में हुमायूँ का मक़बरा बनना चालू हो गया था लेकिन बनते-बनते हैं सन 1572 में बिल्कुल अच्छी तरह बनकर तैयार हो चुका था उसके बाद हुमायूँ का कब्र हुमायूँ के मकबरे के अंदर ले जाकर दफ़ना दिया गया लेकिन वर्तमान में 100 से भी अधिक कब्र है जिसमें हुमायूँ और हुमायूँ की पत्नी हमीदा बानू बेगम और शाहजहाँ के पुत्र दारा शिकाह की क़ब्र तथा उसके उत्तराधिकारी के भी क़ब्र हैं
हुमायूँ का मक़बरा को बनाते समय लाल पत्थर तथा सफेद संगमरमर का पत्थर,नीली टाइलें का प्रयोग किया गया था,विशेषकर वस्तु कला पर बारीकी से ध्यान दिया गया था जो छोटी-छोटी नक्काशी और चबूतरा आदि हुमायूँ के मक़बरे में बनाया गया था,हुमायूँ के मकबरे को बनाते समय जो वास्तुकार थे फारसी वास्तुकार फिराक मिर्ज़ा घियाज(मिर्ज़ा घियासुद्दीन) मक़बरे के बनते समय मौत हो गया था उसके बाद उसके पुत्र सैयद मुहम्मद इब्न मिराक घियासुद्दीन ने इस मक़बरे सन् 1572 बनाकर बिल्कुल तैयार कर दिया था
हुमायूँ का मकबरे के अंदर 100 से भी अधिक क़ब्र है
हुमायूँ का क़ब्रऊपर के चित्र में जो क़ब्र है वो हुमायूँ का क़ब्र है,हुमायूँ के मक़बरे के अंदर 100 से भी अधिक क़ब्र हैं लेकिन बीच के हिस्से में हुमायूँ का क़ब्र है,हुमायूँ का मौत पूराने किले के अन्दर सीढीयों से गिरकर हुआ था उसके बाद हुमायूँ को पूराने किले अन्दर ही दफ़ना दिया गया था,लेकिन बाद में हुमायूँ की पत्नि ने हुमायूँ का मक़बरा बनाया तो उसके बाद हुमायूँ का क़ब्र को पूराने किले से निकलकर हुमायूँ का मक़बरे में दफ़ना दिया गया,हुमायूँ का मक़बरा संगमरमर के पत्थर से बना हुआ है इसके चारों ओर कब्र ही कब्र हैं,जो सभी कब्र संगमरमर के पत्थर से बने हैं और विशेषकर वस्तुकला और नक्काशी पर ध्यान दिया गया है क्योंकि जितना सुंदर यह मक़बरा बाहर से देखने में लगता है उतना ही सुंदर यह मक़बरा अंदर से भी देखने में लगता है
कब्र ही कब्र
हुमायूँ के क़ब्र के अलावा हुमायूँ की पत्नी हमीदा बानू बेगम की भी क़ब्र है और शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह और जहांदर शाह, फर्रूख्शियार, आलममीर,और कई मुगल सम्राट आदि कई उत्तराधिकारी का भी क़ब्र है, हुमायूँ का मक़बरा बेहद खूबसूरत है और चारों और प्रकृति से घिरा हुआ है जिसे चारबाग भी बोलते हैं देखने में बेहद खूबसूरत लगता है इस खूबसूरती को मुगल वास्तु कला,वस्तुकार भी कहा जा सकता है क्योंकि मुगल के समय में वस्तु कला पर विशेष कर ध्यान दिया गया था और एक से एक ऐतिहासिक ईमारत भी बनाया गया था
वास्तुकला
मक़बरे के अन्दर की तस्वीरहुमायूँ का मक़बरा जब बन रहा था तो उस समय वास्तुकला पर विशेष कर ध्यान दिया गया था क्योंकि मुगल के समय में ही वस्तुकला पर विशेषकर ध्यान दिया जाता था जब हुमायूँ का मक़बरा बन रहा था तो उस समय के वास्तुकार थे फारसी वास्तुकार फिराक मिर्ज़ा घियाज(मिर्ज़ा घियासुद्दीन) उन्होंने ने ही हुमायूँ का मकबरा का डिजाइन किया था लेकिन हुमायूँ का मक़बरा बनने से पहले ही उनका मौत हो गया था उसके बाद उसके बेटे ने पुत्र सैयद मुहम्मद इब्न मिराक घियासुद्दीन ने हुमायूँ का निर्माण के सन् 1572 किया था
वास्तुकार को हमीदा बेगम ने खुद चुना था हुमायूँ का मक़बरा और मुगल फारसी वस्तु कला का मिश्रण है, 154 फीट की ऊंचाई है और 299 फीट की चौड़ाई है एक विशाल मक़बरा का मुख्य रूप से लाल बलुआ और पत्थर से बना है संगमरमर का पत्थर का प्रयोग गुबंद के लिए किया गया था जो मक़बरे की डिजाईनिंग को एक बेहद खूबसूरत से बनाया गया है जो देखने में एक अलग ही नज़ार दिखाता है 124 छोटे-छोटे गुबंद कक्ष और फारसी कला का प्रदर्शन दिखाता है और मक़बरे के चारों ओर फारसी शैली में बगीचा बनाया गया जिसे चारबाग के नाम से जाना जाता है
इसा खान का मकबरा
इसा खान का मक़बराजैसे ही आप टिकट घर से हुमायूँ के मकबरे के अंदर प्रवेश करोगें तो आपके दाएँ तरफ इसा खान का मकब़रा दिखेगा है,इसा खान का मक़बरा सन 1547 में शेरशाह सूरी के जीवन काल में बना था यह भी कहा जाता है कि इसा खान शेर शाह सुरी के दरबार में अमीर थे और मक़बरे के बगल में ही मस्जिद है यह मकबरा और मस्जिद शेरशाह सूरी के जीवन काल में बना था,मकबरे के अंदर भी कब्र ही कब्र हैं और छतररियों,चमकदार,टाइलें से बनाया गया है,उसकी ओर बड़ी मस्जिद है विशाल पत्थर केंद्र दरवाजा है इसा खान का मक़बरा देखने में बेहद ही खूबसूरत लगता है इस पर छोटी-छोटी आकार की नक्काशी और संगमरमर का पत्थर का भी प्रयोग किया गया है क्योंकि इस मक़बरे के अंदर कई क़ब्र हैं जो संगमरमर के पत्थर से बने हैं
मस्जिद
हुमायूँ का मक़बरे के बगल में मस्जिदइसा खान के मक़बरे के बगल में ही मस्जिद है,मस्जिद के ऊपर में ही 3 गुबंद बना हुआ है जो हरे और काले रंग से रंगा गया है वस्तु कला का प्रदर्शन इस मस्जिद के ऊपर भी देखने को मिलेंगे,क्योंकि इसकी जो नक्काशी हुमायूँ के मक़बरे से मिलता जुलता है मस्जिद ओर तीन दरवाजे हैं और एक बगल में दरवाजा और दूसरा भी बगल में दरवाजा है,इस मस्जिद के अंदर 5 दरवाज़े और यह मस्जिद का जो मुख्य द्वार है सीधा इसा खान के मक़बरे के द्वार से जुड़ता है
विशाल दरवाजा
विशाल दरवाज़ाजैसे ही आप दूसरा दरवाज़ा से सामने की ओर देखोगे तो एक विशाल दरवाज़ा दिखेगा यह दरवाज़ा हलीमा के मक़बरे के बगीचे तक ले जाता है हलीमा के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलता हैं,लेकिन यह दरवाज़ा के सीधे हलीमा मक़बरे और बगीचे की और ले जाता है,दीवार के दो उतरी गुबंदी और छतरियाँ से सुरक्षित है 16वीं शताब्दी में बगीचे की और पश्चिमी दीवार से कुछ हिस्से को तोड़कर प्रवेश दीवार बनाया गया था
इस दरवाज़े के अंदर कुछ हुमायूँ के इतिहास के बारे में उल्लेख मिलता है और हुमायूँ के मक़बरे के बारे में भी कुछ उल्लेख है इस दरवाज़ के अंदर इसा खान का मक़बरा में जब खुदाई हो रहा था तो कुछ मिट्टी के बर्तन,ईमारत टुकड़े और कुछ घड़ा और छोटे छोटे आकार में संगमरमर के चमकीले पत्थर भी मिले हैं और कुछ ईमारत के टुकड़े मिले हैं,इस दरवाज़े को पार करते ही सामने ही हुमायूँ का मक़बरा दिखेगा,हुमायूँ के मक़बरे के चारों ओर प्रकृति का नज़ारा आपको देखने को मिलेगा,जिसे 4 बाग भी बोलते हैं
दूसरा दरवाजा
दूसरा दरवाज़ाजैसे ही आप टिकट घर से टिकट लेकर हुमायूँ के मक़बरे की ओर बढ़ोगे तो विशाल दरवाज़ से पहले ही दूसरा दरवाज़ा आता है जो काफी सुंदर है,इस दरवाज़े के आसपास सुंदर सुंदर सा पार्क है,यह दरवाज़ भी किसी ऐतिहासिक ईमारत से कम नहीं है जो बेहद ख़ूबसूरत लगता है देखने में यह दरवाज़ा,इस दरवाज़े से जैसे ही आप प्रवेश करोगे तो एक विशाल दरवाज़ा आता है और विशाल दरवाज़े से आप जैसे ही आगे की और बढ़ोगे तो हुमायूँ का मक़बरा आपको सामने ही दिखेगा,वहाँ से देखने में नज़ारा ही कुछ अलग लगता है
हुमायूँ के बारे में
हुमायूँ बाबर का पुत्र था वैसे तो बाबर के चार पुत्र थे लेकिन हुमायूँ उनका सबसे बड़ा बेटा था बड़ा बेटा होने के कारण जब बाबर का मौत हुआ तो 29 दिसंबर 1530 में आगरा के किले में हुमायूँ को सिंहासन पर बैठा दिया गया फिर आगरा और दिल्ली का सिंहासन हुमायूँ संभालने लगा,लेकिन हुमायूँ ने 1533 में दीनपनाह नाम का शहर को बसाया जो वर्तमान में दिल्ली के पुराने किले के नाम से मशहूर है,और अंत में पुराने किले के अंदर एक शेर मंडल है और वहीं से हुमायूँ गिरकर मर गया था,हुमायूँ के समय में शेर मंडल एक संग्रहालय हुआ करता था जहाँ से हुमायूँ पुस्तक हाथ में लिए सीढ़ियों से नीचे गिर कर मर गए थे,उसके बाद पुराने किले के अंदर ही दफ़ना दिया गया था
पुराना किला
हुमायूँ के शासनकाल में पुराने किले का नाम दीनपनाह बना हुआ करता था उस समय हुमायूँ का शासन काल चल रहा था लेकिन शेरशाह सूरी के बीच में जब युद्ध हुआ तो हुमायूँ शेरशाह सूरी से युद्ध में हार गया और किसी तरह जान बचाकर हुमायूँ भारत छोड़कर चला गया,लेकिन जब 1545 में शेरशाह सूरी का देहांत हो गया उसके बाद हुमायूँ ने शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारी पर हमला कर दिया जिनका नाम था सिकंदर सूरी उसके बाद हुमायूँ ने दुबारा पुराना किला पर अपना सिंहासन संभालना,और पूराने किले के सीढ़ियों से गिरकर हुमायूँ मर गया था वही पर हुमायूँ को दफ़ना दिया गया था
फिर हुमायूं की पत्नी ने हुमायूँ का मक़बरा बनाने के लिए सोचा उसके बाद 1565 से लेकर 1572 के बीच में हुमायूँ का मकबरा बना था लेकिन वैसे तो चालू 1565 में ही हो गया था लेकिन बनते बनते सन 1572 बिल्कुल बनकर तैयार हो गया था,इस काम में हुमायूँ की पत्नी और हुमायूँ का बेटा अकबर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाया था,जब हुमायूँ का मक़बरा बिल्कुल बनकर तैयार हो गया था तो हुमायूँ के कब्र को वहीं दफना दिया गया हुमायूँ के मक़बरे के बीच में हुमायूँ का कब्र है वैसे तो काफी क़ब्र है लेकिन बीच में हुमायूँ का कब्र है
हुमायूँ के मकबरे के पास कैसे पहुँचे?
निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास में ही हुमायूँ का मकबरा है जहाँ से 2.8 किलोमीटर दूरी पर ही हुमायूँ का मकबरा है वहाँ से निकलकर ऑटोरिक्शा या बैटरी रिक्शा या फिर बस से आप आ सकते हो हुमायूँ का मकबरा
हुमायूँ के मकबरे के पास से कौन कौन सा बस जाती है?
हुमायूँ के मकबरे के पास में ही बस स्टॉपबस नम्बर 19,101,181,181A,274,166,402,403,405,405A,408,871,894,966,
टिकट घर
भारतिय नागरीक
हर इंसान पर 40रु
15 साल के बच्चों का मुफ़्त है
टोकन खो जाने पर ₹100 जुर्माना
विदेशी नागरीक
हर इंसान पर 600रू
15 साल के बच्चों का मुफ़्त है
टोकन खो जाने पर ₹100 जुर्माना
प्रश्न और उत्तर
- प्रश्न हुमायूँ का मकबरा कहाँ पर है
- उत्तर दिल्ली में
- प्रश्न हुमायूँ का मक़बरा किसने बनाया था?
- उत्तर हमीदा बानू बेगम ने
- प्रश्न हुमायूँ का मक़बरा को क्या कहते हैं?
- उत्तर शयनागार
- प्रश्न हुमायूँ का बेटा कौन था
- उत्तर जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर
- प्रश्न हुमायूँ का पूरा नाम क्या है?
- उत्तर नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ
- प्रश्न हुमायूँ का जन्म कब हुआ था?
- उत्तर 6 मार्च 1508
- प्रश्न हुमायूँ का मौत कब हुआ था?
- उत्तर 1 जनवरी 1556 में
- प्रश्न हुमायूँ कैसे मरा था?
- उत्तर पुराने किले के अंदर एक शेर मंडल है और शेर मंडल की सीढ़ियों से गिरकर हुमायूँ का मौत हो गया था
- प्रश्न हुमायूँ का क़ब्र कहाँ पर है?
- उत्तर वर्तमान में हुमायूँ का क़ब्र हुमायूँ के मक़बरे के अंदर हैं
- प्रश्न हुमायूँ ने दीनपनाह शहर कब बसाया था?
- उत्तर 1533 में
- प्रश्न दीनपनाह किला किसे कहते है?
- उत्तर दिल्ली का पुराना किला को
- प्रश्न इसा खान का मक़बरा कब बना था,और किसके काल में बना था?
- उत्तर 1547 में शेरशाह सूरी के जीवन काल में
- प्रश्न शेरशाह सूरी का मौत कब हुआ था?
- उत्तर 1545 में
- प्रश्न हुमायूँ के मकबरे को बनाते समय वास्तुकार कौन थे
- उत्तर वास्तुकार थे फारसी वास्तुकार फिराक मिर्ज़ा घियाज(मिर्ज़ा घियासुद्दीन)
- और उनके पुत्र सैयद मुहम्मद इब्न मिराक घियासुद्दीन ने
- प्रश्न हुमायूँ की पत्नी कौन थी?
- उत्तर वैसे तो हुमायूँ की काफी पत्नियाँ थी लेकिन हमीदा बानू बेगम उनकी खास पत्नी थी










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